बिछड़ के तुझसे न जीते हैं और न मरते हैं

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बिछड़ के तुझसे न जीते हैं और न मरते हैं
अजीब तरह के बस हादसे गुज़रते हैं

बड़ा सुकून है, दिन चैन से गुज़रते हैं
हम अब किसी से नहीं बस ख़ुदा से डरते हैं

कुछ ऐसे रास्ते जिनकी नहीं कोई मंज़िल
हमारा रास्ता बस काट कर गुज़रते हैं

कभी, निगाह, कभी पैरहन, अदाएँ कभी
कई ज़बानों में अक्सर वो बात करते हैं

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ज़मीन छोड़ न पाऊंगा, इंतज़ार ये है
वो आसमान से धरती पे कब उतरते हैं

ये किसने खींच दी साँसों की लक्ष्मण-रेखा
कि जिस्म जलता है, बाहर जो पाँव धरते हैं

ये चांद, तारे, ज़मीं और आफ़ताब तमाम
तवाफ़ करते हैं, किसका तवाफ़ करते हैं

हयात देती हैं साँसें, बस इक मुक़ाम तलक
फिर उसके बाद तो बस साँस-साँस मरते हैं

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