पिता का सबक – “सब्र”

एक 30 का लड़का अपने पिता से मिलने गया। उसके पिता की नज़र थोड़ी कमज़ोर हो चुकी थी। जब वो दोनो आपस में बात कर रहे थे तभी एक कबूतर उड़ कर कर आया और उनकी खिडकी पर बैठ गया।

पिता ने पूछा “क्या ये कबूतर है जो खिड़की पर आकर बेठा है?” बेटे ने जवाब दिया “जी पिताजी”। थोड़ी देर बाद पिता ने दोबारा फिर वही सवाल पूछा और उन्हें वही जवाब मिला। जब उन्होंने वही सवाल तीसरी बार पूछा तो बेटे ने ग़ुस्से मे कहा “इसीलिए मैं आपके पास आने से चिढ़ता हूँ, आप एक सवाल को दोहराते बोहोत हैं!”

10 मिनिट की खामोशी के बाद पिता ने अपने बेडरूम से अपनी पुरानी डायरी मंगवाई ओर अपने बेटे से कहा की इस का पेज नम्बर 2 पढ़ो। उस में लिखा था- “आज मेरा बेटा 3 साल का हो गया है। जब हम घर के बाहर खेल रहे थे एक कबूतर आ कर मेरी खिड़की पर बेठा। मेरे बेटे ने मुझ से 30 बार पूछा की क्या ये कबूतर है ? में ने हर बार खुशी से “हां” मे जवाब दिया। मैं बता नहीं सकता की आज में कितना खुश हूँ। आज मेरा बेटा बोलना सीखा है। आज का दिन यादगार रहेगा।”

लड़के के हाथ से डायरी छूट गयी और वो रो कर अपने पिता से माफी मांगने लगा। पिता बोले “कोई बात नही बेटा। एक ग़लती से तुम बुरे इंसान नही बन जाओगे, लेकिन एक ही ग़लती बार बार दोहराने से किसी भी इंसान की इंसानियत मर जाएगी। मरने से पहले आज मैं ने तुम्हें अपनी ज़िन्दगी का आखरी सबक सिखाने के लिए बुलाया है। आज का सबक है “सब्र” ।

हमेशा अपने दिल में गरीब और कमज़ोरों के लिए दया और ममता रखना। अपने अच्छे और तरक़्क़ी के वक्त में सबसे अच्छा बर्ताव रखना। क्यों कि तुम्हारे बुरे वक्त में वही लोग तुम्हें ज़रूर मिलेंगे। जिस इंसान की तुम आज बेइज़्ज़ती करोगे हो सकता है वो कल तुम्हे उस की ज़रूरत पड़ जाए।”

हमें बुरे से बुरे हालात में भी सब्र करना और बर्दाश्त करना सीख लेना चाहिए। यही नियति है

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