दौड़ रहे हैं

दौड़ रहे हैं
भौतिकता की अंधी दौड़ में
दम तोड़ चुकी हैं अतीत की
आत्मीय समृद्ध परम्पराएं
शेष हैं सिर्फ दैहिक भोग्या कामनाएं
कहीं पीछे छूट चुके हैं
हमारे जीवन मूल्य
नैतिक और सामाजिक रिश्ते
आज आदमी को है सिर्फ
खुद से ही सरोकार
सिरमौर है व्यभिचार ।
स्वस्थ चिंतन, स्वस्थ रिश्ते
विश्वसनीय एहसास
न जानें कहाँ लुप्त हो गए हैं
समझ नही आ रहा
हम जाग रहे हैं
या सुप्त हो गए हैं ?

zindagi.jpg

Leave a Reply