सुहागरात यानि वेडिंग नाइट की सच्चाई क्या है?

जितने जोड़े…..सच कहूं तो उतनी सच्चाइयां। कुछ पर गौर फरमाइए:—

(i)

सारे रस्म-ओ-रिवाज़ निबटा कर घबराई दुल्हन ने दूध का गिलास पकड़े हुए कमरे में प्रवेश किया….घबराए दूल्हे ने फौरन गिलास पकड़ कर टेबल पर रखा और अर्धांगिनी को आधा ‘बेड’ सौंप दिया |

कमरा फिल्मी सुहाग-सेज की तरह सजा हुआ नहीं है। घर महमानों से भरा पड़ा है। इसलिए कबाड़ घर को ही व्यवस्थित कर के एक चारपाई डाल दी गई है। रात के सन्नाटे में कभी किसी के खांसने की आवाज़, कभी किसी के छींकने की, कभी फुसफुसाने की और कभी खर्राटों की आवाज़(थोड़ा बदबूदार है पर कभी-कभी किसी सज्जन द्वारा की गई वायुशुद्धि की आवाज़ भी)यदा-कदा शांति को भंग कर देती है।

दुल्हन दिन भर की थकी है अतः सोना चाहती है परंतु दूल्हा छेड़-छाड़ पर उतारू है। इतनी थकान और ऐसे माहौल को देख कर किस दुल्हन का मन होगा प्रेमालाप का?

अतः इस बार जब दूल्हे ने चिकोटी काटी तो खीझती हुई दुल्हन ने झल्लाकर कहा……सो जाओ, तड़के ठाकुर जी को पूजने जाना है….और पलट कर….सुहागरात समाप्त।

(ii)

नशे में धुत्त दूल्हे ने एकांत में दुल्हन को देखा….एक तो नारी शरीर ऊपर से लाइसेंस प्राप्त….यौनिच्छा ने पागल कर दिया….बस टूट पड़ा….सुहागरात समाप्त।

(iii)

दूल्हे ने कमरे में प्रवेश किया और “सुहागरात है घूंघट उठा रहा हूँ मैं, सिमट रही है वो शर्मा के अपनी बाहों में” वाली पंक्तियां चरितार्थ हो गईं।दूल्हे ने हौले-हौले दुल्हन के हाथों को अपने हाथ में लिया और चूम लिया।

बातचीत का प्रयास किया पर दुल्हन शर्मीली ज्यादा है इसलिए जल्दी ही समझ गया कि पहल उसी को करनी होगी। और कुछ देर बाद उसने पहल कर दी। दुल्हन ने भी स्वयं को समर्पित किया और सुहागरात समाप्त।

(iv)

दूल्हे-दुल्हन ने एक दूसरे को देखा….

एकांत पाते ही दोस्तों-सहेलियों और रिश्तेदारों की तमाम नसीहतें याद आ गईं। दूल्हे को याद आया कि आज तो बाजी मारनी ही है…..दुल्हन ने सोचा कि आज तो तरसाऊंँगी। दूल्हा हराने को मुस्तैद और दुल्हन हर पैंतरे से बचने को। दोनों की खट-पट में पहले तो बाबूजी की रोज़ से कुछ ज्यादा ही तेज़ खाँसने की आवाज़। पर अंदर के घमासान में सुनाई किसे देता है……

थक-हार कर अम्मा को ही बोलना पड़ा….लल्ला औरों को भी सोना है। …..सुहागरात समाप्त।

(v)
दूल्हा: और जी….क्या आज भी दूर से ही दर्शन करने होंगे?
दुल्हन: मैंने ऐसा कब कहा(आंखे तरेरते हुए)

दूल्हा: तो इतनी दूर काहे बैठी हो

दुल्हन: अच्छा! ऐसा भी कभी होता है सुहागरात पर!

दूल्हा: ओहो! तुम्हें बड़ा पता है कि क्या होता है सुहागरात पे।

दुल्हन: बिल्कुल…चाची ने सब समझाया था…अच्छे से। मुझे तो लगता है तुम ही निपट मूर्ख हो।

दूल्हा: अबे जाओ! तुम्हारी चाची खुदई मूर्ख हैं वो क्या शिक्षा दी होंगी।

दुल्हन: ओए…..

दूल्हा: अच्छा सॉरी भाई….लेकिन मैं भी मूर्ख नहीं हूं

दुल्हन: अच्छा, तो निकालो

दूल्हा: वाह बेटा….अभी निकालते हैं

दुल्हन खुशी से चहकते हुए खड़ी हो गई और हाथ बढ़ा दिया

दूल्हा: ये क्या है बे!?

दुल्हन: बस अब बनाओ मत….जल्दी से हमारे हाथ पर रखो

दूल्हा: हाथ पर….यूं ही…!

दुल्हन: और नहीं तो क्या! अब दोगे भी!

दूल्हा: देता हूँ, सब्र करो(कुर्ता उतारते हुए)

दुल्हन: ये क्या कर रहे हो! समझ लेना तुम जो बिना मेरी मर्ज़ी के मेरे पास भी आये तो….

दूल्हा: अजीब होती हो तुम लड़कियां भी….कभी चाहिए…कभी नहीं….अभी तो उतावली हुई जा रही थी….अब ये नोटंकी!

दुल्हन: देखो बहाने मत बनाओ गुस्साने के, मुझे पता है….तुम भूल गए हो….तुमसे शादी ही नहीं करनी चाहिए थी…..मां सही कहती थी…..लड़का सही नहीं है….(सुबकते हुए)….जाओ बात मत करो…

दूल्हा:मुझे भी तुमसे कोई बात नहीं करनी…….. भूल गया हूँ……..!!……..एक मिनट…….तुम्हें चाहिए क्या था!?

दुल्हन: बात मत करो तुम मुझ से

दूल्हा: अरे बताओ न मेरी जान…

दुल्हन: सुहागरात वाले दिन एक ही तो चीज़ दी जाती है दुल्हन को

दूल्हा: बताओगी भी….(खीजते हुए)…..क्या?

दुल्हन: गिफ्ट….(पलटकर बुक्का फाड़ते हुए)

दूल्हा: दूसरी तरफ पलट कर…..सो जाओ।

सुहागरात समाप्त।

(इतनी सच्चाइयां काफी हैं मेरे ख्याल से)

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